नई दिल्ली। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) बैंकिंग सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त नकदी यानी लिक्विडिटी को कम करने के लिए 1 लाख करोड़ रुपये के सरकारी बॉन्ड बेचने जा रहा है। करीब दो साल बाद यह RBI की पहली नेट बॉन्ड बिक्री होगी। बॉन्ड की बिक्री तीन चरणों में की जाएगी। पहली नीलामी 17 सितंबर को 50,000 करोड़ रुपये की होगी, जबकि इसके बाद 21 सितंबर और 28 सितंबर को 25-25 हजार करोड़ रुपये के बॉन्ड बेचे जाएंगे।
RBI के मुताबिक, इन सरकारी सिक्योरिटीज की मैच्योरिटी वित्त वर्ष 2029 से 2032 के बीच होगी। केंद्रीय बैंक का यह कदम ऐसे समय में आया है, जब बैंकिंग सिस्टम में 10 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की अतिरिक्त लिक्विडिटी मौजूद होने की बात कही जा रही है।
17 सितंबर को होगी पहली नीलामी
RBI की योजना के तहत पहली नीलामी 17 सितंबर को होगी। पात्र प्रतिभागी सुबह 9:30 बजे से 10:30 बजे तक RBI के E-Kuber सिस्टम के जरिए अपनी बोली लगा सकेंगे। नीलामी के परिणाम उसी दिन घोषित किए जाएंगे।
इस नीलामी में मल्टी-सिक्योरिटी ऑक्शन और मल्टीपल-प्राइस मेथड का इस्तेमाल किया जाएगा। यानी एक से अधिक सरकारी सिक्योरिटीज की बोली लगाई जाएगी और अलग-अलग बोलियों के आधार पर कीमत तय होगी।
बैंकिंग सिस्टम में बढ़ी अतिरिक्त नकदी
RBI का यह फैसला बैंकिंग सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त लिक्विडिटी को नियंत्रित करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। बैंकों ने RBI की विशेष फॉरेक्स मोबिलाइजेशन स्कीम के तहत उम्मीद से ज्यादा 127 अरब डॉलर जुटाए हैं। इससे विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ने के साथ बैंकिंग सिस्टम में रुपये की नकदी भी बढ़ी है।
जब बैंकों के पास जरूरत से ज्यादा नकदी होती है तो उनके पास कर्ज देने और निवेश करने के लिए अधिक पैसा उपलब्ध रहता है। इससे बाजार की शॉर्ट टर्म ब्याज दरों पर दबाव पड़ सकता है।
ज्यादा लिक्विडिटी से ब्याज दरों पर असर
बैंकिंग सिस्टम में अतिरिक्त पैसा होने के कारण ओवरनाइट ब्याज दरें RBI के रेपो रेट से नीचे जाने की स्थिति बनी है। RBI का मानना है कि अगर सिस्टम में बहुत अधिक लिक्विडिटी बनी रहती है तो मौद्रिक नीति का असर कमजोर हो सकता है।
इसी वजह से केंद्रीय बैंक सरकारी बॉन्ड बेचकर बाजार से अतिरिक्त नकदी वापस खींचने की कोशिश कर रहा है। इसका उद्देश्य बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी को ऐसे स्तर पर बनाए रखना है, जिससे मौद्रिक नीति का प्रभाव प्रभावी बना रहे।
महंगे क्रूड से महंगाई का दबाव भी चिंता
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी भी RBI के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। महंगा क्रूड ट्रांसपोर्ट और उत्पादन से जुड़ी लागत को बढ़ा सकता है, जिसका असर आगे चलकर महंगाई पर पड़ सकता है।
ऐसे माहौल में अतिरिक्त लिक्विडिटी को नियंत्रित रखना RBI के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सरकारी बॉन्ड की बिक्री इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा है।
RBI के ऐलान के बाद बॉन्ड यील्ड बढ़ी
RBI की बॉन्ड बिक्री की घोषणा के बाद सरकारी बॉन्ड बाजार में तत्काल प्रतिक्रिया देखने को मिली। 10 साल की बेंचमार्क सरकारी बॉन्ड यील्ड बढ़कर 7.035% तक पहुंच गई। इसमें दिन के दौरान करीब 6 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
वहीं, 5 साल की बॉन्ड यील्ड भी 10 बेसिस पॉइंट बढ़कर 6.6222% तक पहुंच गई। बॉन्ड यील्ड में यह बढ़ोतरी बाजार में RBI के फैसले के प्रभाव को दिखाती है।
आम लोगों पर क्या पड़ेगा असर?
RBI का सरकारी बॉन्ड बेचना सीधे तौर पर आम लोगों के बैंक खातों से पैसा निकालने जैसा नहीं है। इसका मुख्य उद्देश्य बैंकिंग सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त नकदी को कम करना है।
हालांकि, बॉन्ड यील्ड और बाजार की ब्याज दरों में बदलाव का असर आगे चलकर लोन की ब्याज दरों और निवेश के रिटर्न पर पड़ सकता है। होम लोन, ऑटो लोन और अन्य कर्ज की दरों पर इसका असर बाजार की प्रतिक्रिया और बैंकों की फंडिंग लागत के आधार पर देखने को मिल सकता है।
वहीं, फिक्स्ड इनकम और सरकारी बॉन्ड जैसे निवेश विकल्पों में भी यील्ड में बदलाव का असर पड़ सकता है। फिलहाल RBI का मुख्य फोकस बैंकिंग सिस्टम में अतिरिक्त लिक्विडिटी को नियंत्रित करने और मौद्रिक नीति के प्रभाव को बनाए रखने पर है।
