विजयादशमी के अवसर पर होने वाले रावण दहन को लेकर उज्जैन में नया विवाद सामने आया है। रावण दहन के आयोजन पर आपत्ति जताते हुए रामलीला समितियों को पत्र भेजे जाने और इस विषय पर शास्त्रार्थ का प्रस्ताव रखे जाने के मामले में क्षत्रिय मूलनिवासी महासंघ ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। संगठन ने इसे धार्मिक परंपराओं से जुड़ा मुद्दा बताते हुए जातिगत भेदभाव और श्रेष्ठता की मानसिकता पर सवाल उठाए हैं।
क्षत्रिय मूलनिवासी महासंघ के अनुसार, विजयादशमी पर रावण दहन की परंपरा लंबे समय से बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में निभाई जाती रही है। संगठन का आरोप है कि कुछ लोग रावण को अलग रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं और रावण दहन की परंपरा पर सवाल खड़े कर रहे हैं। महासंघ ने कहा कि धार्मिक मान्यताओं को जातिगत आधार पर देखने के बजाय उनके सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व को समझना चाहिए।
संगठन ने भगवान परशुराम और रावण को लेकर हो रही चर्चाओं का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया कि कुछ लोग धार्मिक पात्रों और मान्यताओं को जाति के आधार पर प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं। महासंघ का कहना है कि धर्म के नाम पर एकता की बात करने वाले लोगों को समाज में जातिगत विभाजन बढ़ाने वाले बयानों से बचना चाहिए।
महासंघ ने अपने बयान में यह भी कहा कि किसी धार्मिक परंपरा को लेकर मतभेद होने पर संवाद और विचार-विमर्श का रास्ता अपनाया जा सकता है, लेकिन इस प्रक्रिया में सामाजिक सौहार्द बनाए रखना जरूरी है। संगठन ने रावण दहन को लेकर उठे विवाद पर अपनी आपत्ति दर्ज कराते हुए जातिगत भेदभाव के खिलाफ जागरूकता बढ़ाने की अपील की।
अपने रुख को स्पष्ट करते हुए क्षत्रिय मूलनिवासी महासंघ ने महात्मा ज्योतिबा फुले की पुस्तक ‘गुलामगिरी’ का उल्लेख किया और लोगों से जातिगत असमानता तथा सामाजिक व्यवस्था से जुड़े ऐतिहासिक विचारों पर अध्ययन करने की अपील की।
फिलहाल, इस पूरे मामले में संबंधित रामलीला समितियों और पत्र भेजने वाले पक्ष की प्रतिक्रिया सामने आना बाकी है। सभी पक्षों का आधिकारिक पक्ष सामने आने के बाद विवाद से जुड़ी परिस्थितियों की स्पष्ट जानकारी मिल सकेगी।
