नई दिल्ली। CJP नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली हाई कोर्ट ने प्रदर्शन की अनुमति और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के मुद्दे पर टिप्पणी की। अदालत ने फ्रांस में छात्र-नेतृत्व वाले उन प्रदर्शनों का उदाहरण दिया, जिनके दौरान कथित तौर पर आगजनी और लूटपाट जैसी घटनाएं हुई थीं। कोर्ट ने कहा कि प्रदर्शन के लिए पुलिस से अनुमति लेने की व्यवस्था का एक उद्देश्य बाहरी लोगों को शामिल होकर विरोध-प्रदर्शन बाधित करने से रोकना भी है।
प्रदर्शन की अनुमति और कानून-व्यवस्था पर चर्चा
सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर चर्चा की कि विरोध-प्रदर्शन के आयोजन में अनुमति की व्यवस्था क्यों महत्वपूर्ण हो सकती है। अदालत की टिप्पणी के अनुसार, इससे प्रदर्शन में शामिल लोगों और बाहरी तत्वों के बीच अंतर करने तथा कानून-व्यवस्था बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
फ्रांस के प्रदर्शनों का संदर्भ देते हुए अदालत ने उन परिस्थितियों की ओर ध्यान दिलाया, जहां विरोध-प्रदर्शन के दौरान कथित तौर पर हिंसा, आगजनी और लूटपाट की घटनाएं सामने आई थीं।
सौरव दास और आशुतोष रांका से जुड़ा मामला
CJP नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका ने अपनी न्यायिक हिरासत बढ़ाए जाने के आदेश को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी है। दोनों नेताओं को जंतर-मंतर पर कथित तौर पर बिना अनुमति प्रदर्शन स्थल में प्रवेश करने और शांति व्यवस्था से जुड़े नियमों के उल्लंघन के आरोपों के बाद हिरासत में लिया गया था।
रिपोर्टों के मुताबिक, विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट ने 19 अक्टूबर को उनकी हिरासत दो दिन के लिए बढ़ा दी थी। इसके खिलाफ नेताओं ने हाई कोर्ट का रुख किया और अपनी हिरासत को चुनौती दी।
प्रदर्शन के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था का सवाल
इस मामले में प्रदर्शन करने की अनुमति, सार्वजनिक व्यवस्था और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मुद्दे चर्चा में हैं। एक ओर शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों का हिस्सा है, वहीं दूसरी ओर प्रशासन को कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी निभानी होती है।
अदालत की टिप्पणी ने इस बहस को फिर सामने ला दिया है कि प्रदर्शन की अनुमति से जुड़ी व्यवस्था किस तरह लागू की जाए, ताकि शांतिपूर्ण विरोध की गुंजाइश बनी रहे और सार्वजनिक व्यवस्था भी प्रभावित न हो। मामले में आगे की सुनवाई और अदालत के आदेश पर नजर रहेगी।
