छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में प्रशासनिक लापरवाही का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। नेहरू नगर स्थित छत्तीसगढ़ हाउसिंग बोर्ड के सामुदायिक भवन को एक व्यक्ति ने अपनी निजी संपत्ति बताकर उसे तोड़ने की अनुमति हासिल कर ली। हैरानी की बात यह है कि सिटी मजिस्ट्रेट ने मालिकाना हक से जुड़े दस्तावेजों की जांच किए बिना ही भवन को ढहाने का आदेश जारी कर दिया। मामला सामने आने के बाद प्रशासन और हाउसिंग बोर्ड के अधिकारियों में हड़कंप मच गया है।
- सरकारी भवन को बताया अपना 80 साल पुराना मकान
जानकारी के अनुसार, नेहरू नगर में स्थित यह सामुदायिक भवन छत्तीसगढ़ हाउसिंग बोर्ड द्वारा क्षेत्र के लोगों के सार्वजनिक उपयोग के लिए बनाया गया था। आरोप है कि कुदुदंड निवासी मोहम्मद अली ने सिटी मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन प्रस्तुत कर दावा किया कि उक्त भवन उसकी निजी संपत्ति है और यह उसका 80 वर्ष पुराना जर्जर मकान है, जिसे सुरक्षा कारणों से तोड़ना आवश्यक है।
- बिना दस्तावेज जांचे जारी हो गया आदेश
बताया जा रहा है कि सिटी मजिस्ट्रेट रजनी भगत ने भवन के मालिकाना हक से संबंधित दस्तावेजों की पुष्टि किए बिना ही ध्वस्तीकरण की अनुमति दे दी। उन्होंने केवल तहसीलदार और पटवारी द्वारा प्रस्तुत मौके की रिपोर्ट के आधार पर आदेश जारी कर दिया।
- तोड़फोड़ शुरू होते ही खुली पोल
ध्वस्तीकरण की अनुमति मिलते ही मोहम्मद अली ने भवन में तोड़फोड़ शुरू कर दी। इसी दौरान वार्ड पार्षद कार्तिक यादव को इसकी जानकारी मिली। उन्होंने तत्काल हाउसिंग बोर्ड के अधिकारियों को मामले से अवगत कराया।
सूचना मिलते ही हाउसिंग बोर्ड के अधिकारियों में हड़कंप मच गया। मौके पर पहुंचकर जब दस्तावेजों की जांच की गई तो पता चला कि जिस भवन को निजी मकान बताकर तोड़ने की अनुमति ली गई थी, वह वास्तव में हाउसिंग बोर्ड की सरकारी संपत्ति है।
- तहसीलदार और पटवारी की भूमिका पर उठे सवाल
आरोप है कि राजस्व अधिकारियों ने न तो भूमि अभिलेखों की सही तरीके से जांच की और न ही हाउसिंग बोर्ड से स्वामित्व संबंधी जानकारी लेने का प्रयास किया। यदि प्रारंभिक स्तर पर ही दस्तावेजों की जांच की जाती, तो सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की नौबत नहीं आती।
- FIR दर्ज, जांच के आदेश
मामले के उजागर होने के बाद संबंधित व्यक्ति के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली गई है। वहीं प्रशासन ने पूरे प्रकरण की जांच शुरू कर दी है। यह भी जांच की जा रही है कि आखिर किन परिस्थितियों में बिना पर्याप्त सत्यापन के सरकारी भवन को निजी संपत्ति मान लिया गया और ध्वस्तीकरण की अनुमति कैसे जारी कर दी गई।